रविवार, 28 जून 2020

दो लोग

दो बरस पहले दो लोग मिले थे
आज वो ढूंढ के भी नहीं मिल पाते हैं
लेकर आए थे साथ जो तुम
थोड़ी अपनी मिश्री थोड़ा अपना नमक
लेकर अाई थी जो मैं
थोड़ी अपनी शहद थोड़ा अपना नमक
अब ना तुममें मिश्री है
ना मुझमें नमक
अब ना मुझमें मिठास है ना तुममें नमक
बस अब तुम्हारी गर्मी मुझमें है
और तुम में सांस लेती है
मेरी वही गमक
आंखें अब भी जब टकराती हैं
बोलती भी हैं और शर्माती भी हैं
जान अब भी है
मगर उतनी ही जितनी
 सांस खींच ले जाती है
 दो हाथ अब भी एक दूसरे को
 एक ही जिस्म और जान का हिस्सा जानते हैं
 दोनों के सिर अब भी अपना अपना सिरहाना
 अपने हमजान के सीने पे पहचानते हैं
 बस पहले दो जानें
 खुशियों के लिबास में
 संवर कर आती थीं
 अब दो मर्ज़ मिलते हैं
 अपने अपने मुदावे से
 और कफ़नों में लिपट के आते हैं
 जीने भर को ज़रूरी हो जितना
 उतना भर
 हवा से नमक
 आसमां से मिश्री चुराते हैं
 जीने भर को ज़रूरी हो जितना
 बस उतना ही जी के रह जाते हैं।



सौम्या वफ़ा।(6/2/2020).

रात

रात तेरे पहलू से मैं
सुबह को जो निकला हूं
ख़ुद से बेगाना हूं
रूह से बिछड़ा हूं
सूरज ने दिन का उजाला
तो दिखाया है
पर रात के अंधेरों में
अपना साया खो आया हूं
रात तेरे पहलू से मैं
सुबह को जो निकला हूं
ख़ुद से बेगाना हूं
रूह से बिछड़ा हूं
दिन की सारी कमाई लेकर
कोई एक रात मुझे फिर
रात के साथ दिला दे
मैं रात रात भर
रात के लिए तड़पा हूं
रात तेरे पहलू से मैं
सुबह को जो निकला हूं
ख़ुद से बेगाना हूं
रूह से बिछड़ा हूं।



सौम्या वफ़ा। (18/8/2019).

खिड़कियां

ये खिड़कियां भी कमाल होती हैं
खिड़कियां नहीं ख़्वाब होती हैं
दम तोड़ते शहर में
जीते रहने की खुराक होती हैं
ये खिड़कियां भी कमाल होती हैं
तेरी खिड़की में झांकती मेरी खिड़की
हर बात का हिसाब होती है
दौड़ते हुए लम्हों का
थमा खि़ताब होती हैं
इस खिड़की की चाहत बेहिसाब होती है
एक छोटी सी ही खिड़की हो
मगर हो तो सही
उम्र भर यही मुराद होती है
एक खिड़की हो तुम्हारी
एक खिड़की हो मेरी
इस कोशिश में
हर रात तमाम होती है
ये खिड़कियां भी कमाल होती हैं।








सौम्या वफ़ा।(3/1/2019).

दुआ

जब हम नहीं पहुंच पाते
तो दुआ भेज देते हैं
नम आंखों को
नर्म आवाज़ को
ख़ुद में समेट लेते हैं
घर का दरवाज़ा खटखटाते हैं
केवल मुस्कुराहटें और तोहफ़े
और बातों बातों में ही बस
मिठाईयां बटोर लेते हैं
हलक में जाने क्या अटक सा जाता है
झाड़ पोंछ कर उसे फ़िर
एक बक्से में लपेट देते हैं
इसी तरह दूर दूर से हम
करीब के सारे
रिश्ते सहेज लेते हैं
जब हम नहीं पहुंच पाते हैं तो
दुआ भेज देते हैं।



सौम्या वफ़ा।(14/8/2019)

वादा

ज़्यादा तो कुछ नहीं
बस इतना वादा कर सकती हूं
तुम ज़िंदा रहो तो
जीते जाने का वादा कर सकती हूं
तुम फूल नहीं ना सही
पुंकेसर ही दे दो
मैं रस बनकर बरस जाने का वादा कर सकती हूं
मैं कल तो नहीं थी तुम्हारी
पर तुम मुझे आज दे दो
मैं आने वाले हर कल में
अपने हिस्से का ब्याज भर सकती हूं
गेहूं चुनकर आओ जब तुम
तो मैं ठंडे पानी का घूंट बन सकती हूं
ज़्यादा तो कुछ नहीं
बस अपने साथ साथ तुमको भी
ज़िंदा रख सकती हूं
तुम ज़िंदा रहो तो
जीते जाने का वादा कर सकती हूं
ज़्यादा तो कुछ नहीं
बस इतना वादा कर सकती हूं।


सौम्या वफ़ा।(11/8/2019).

थोड़ी अब भी ज़िंदा हूं मैं

थोड़ी अब भी ज़िंदा हूं मैं
कभी कभी आज भी ऐसा लगता है
खिड़की से आती हवा का
चेहरे को सहलाना अब भी अच्छा लगता है
सड़क पर चलते चलते बेखबर
सीटी बजाना अब भी अच्छा लगता है
अब भी अच्छा लगता है
शरारत करना
अच्छा लगता है पानी को छूना
किसी पंछी संग ख्यालों में उड़ जाना
टीन की छत पर नंगे पाओ फुदकना
दो बादलों के फुग्गों बीच
टांगे पसारे तैरते चले जाना
अब भी अच्छा लगता है
बुखार में आइसक्रीम खाना
अच्छा लगता है उड़ते जहाज़ की पूंछ पकड़ कर
हो हो चिल्लाना
किसी नौसिखुए की पतंग लूट लाना
अब भी अच्छा लगता है
पड़ोसी के घर की दीवारें फांद जाना
अच्छा लगता है अब भी
दरवाज़ा खटखटा कर भाग जाना
अब भी अच्छा लगता है
 छिपे रहकर टीप मार जाना
 अच्छा लगता है बस इस
 अच्छे लगने के एहसास में
 अच्छे लग जाना
 एक लंगड़ी टांग से
 इक्खट दुक्खट में
 दुनिया नाप जाना
थोड़ी अब भी ज़िंदा हूं मैं
कभी कभी आज भी ऐसा लगता है।




सौम्या वफ़ा।(9/8/2019).

कैक्टस

कैसे होता है यूं
कि जब सपनों के पास आते जाते हैं
तो वो जो दूर रहने पे
खिले थे प्रेरणाओं के फूल
वो कैसे मुरझा जाते हैं
हकीकत की सड़ांध और बू से
तब कितना ज़्यादा लगता है
कि काश
हर फूल के पास कांटों का सुरक्षा कवच होता
बिना किसी बाग़बां या माली के
कड़ी धूप में बिना पानी के
ज़िंदा रखता
फ़िर अचानक नज़र के सामने
जानी पहचानी मगर बिसर चुकी सूरत
खिल उठती है
ये बिसर चुकी सूरत बारह साल की
लिली जैसी नाज़ुक नर्म और मासूम सी लड़की है
फ़िर सोलह की टियूलिप
फ़िर अटराह की जूही
फ़िर बीस की ग़ुलाब
ये सारे फूल पत्तों के एल्बम में बदल जाते हैं
जहां यादें तो अब भी बहुत सी ताज़ा हैं
मगर वो सब अब सिर्फ़ यादें ही हैं
क्यूंकि उनमें से कोई भी अब ज़िंदा नहीं
और ये पन्नों के पत्ते पलटते पलटते
जा रूकते हैं छब्बीस की कैक्टस पर
जिसके जिस्म का रोम रोम
कांटों की तरह तनकर खड़ा हो जाता है
गर्व और मुक्ति से
आंखों में अब नमी नहीं आती
वो खूंखार और ठोस हो चुकी हैं
तो फ़िर नमी कहां गई ?
वो सारी कांटों को पालने में चली गई
और बची खुची नमी
का स्टॉक एक कोने में पड़ा है
क्या पता कब काम आ जाए
आखिर कांटों को सींचने में भी
नमी की ही ज़रूरत होती है
और इस नमी और कांटों के
मधुर संबंध के दरम्यान
रेत का बवंडर
धीरे धीरे अपनी जगह बनाता रहता है
जिसके इर्द गिर्द केवल वही पनपते हैं
जिन्हें संगीत के बजाए
डरावनी सांय सांय पसंद है
ऐसे खौफ़नाक से मंज़र में
जहां ज़िन्दगी का नामो निशान नहीं होता
वहां ज़िन्दगी की निशानी लेकर
गर्व से खड़ी होती हैं
मुक्त कैक्टस की ख़ामोश बाहें
नमी और चुभन का संतुलन बनाए हुए
जिसे बरसात का कोई इंतज़ार नहीं
जो बस एक बूंद में ही तर हो जाती है
और जी जाती है
मैं अब यही कैक्टस हो चुकी हूं
और अगर तुम अब
 फूलों से नाज़ुक बनकर आओगे
तो छिल जाओगे।





सौम्या वफ़ा।(29/1/2018).