मंगलवार, 11 अगस्त 2020

रेशमी ख़्वाब

 तुमने कै़द किया है

 ख़्वाबों को इन आंखों में

या क़ैद हो तुम ही कहीं

जहां भर के ख़्वाबों में

आंखों से पूछो ये किन्हें सम्हालती हैं,

टकटकी लगाए रातों में?

ज़ेहन में झांको ये क्या ढूंढता है,

बेतुक बुदबुदाती बातों में?

काते हैं तागे ख़्वाब के

सहेजे हैं परतों में किमख़ाबों के

या उलझे उलझे हैं हम ही

रेशम के धागों में?

पर आ गए हैं वक़्त पे

उड़ने को;

या उड़ रहे हैं ख़्वाबों में?

तुमने कै़द किया है

 ख़्वाबों को इन आंखों में

या क़ैद हो तुम ही कहीं

जहां भर के ख़्वाबों में!



सौम्या वफ़ा।©


सोमवार, 10 अगस्त 2020

मोहे ऐसे सतायो श्याम

 मोहे ऐसे सतायो श्याम 

रूठा गली गलियार 

मोसे छूटे चहुँ  धाम 

मोहे ऐसे सतायो श्याम 

छुट गयो पनघट डगरिया 

छोटे मोसे मथुरा का आँगन 

छुट गयो नगरी 

मोसे टुट गयो मोरी गगरिया 

छूटे साज 

छूटो रंग राग

लागो बैरागी अनुराग  

सुर साजे जोग मोहे 

मोहे भाये न शाम बिन जमुना के तीरे 

तंग करत उछलत गिरत प्रेम तरंग 

 प्रेम बैरी का है बैर मोसे 

छूटे जो शाम मोरे 

बरसी  बरखा उमड़ी जमुना 

बह गयी मोरी अखियन से मेहंदी

बह गयी लाली मतवाली 

 बही संग संग चितवन 

बह गयो लाज संग 

चुनरी लहरिया 

जो ऐसे सतायो श्याम 

छोड़ गयो बिरहन को जान अनजान 

आयो ना शाम से फिर 

घर लौट के फागुन 

पलट गयो  मोरी डेहरी से ऋतुयन  

ना लागे हल्दी बसंती 

बिखर गयो  माथे की  बिंदिया 

बह गयो  संग शाम के 

शाम की सिन्दूरी गोधूलि 

कारी कारी डगरिया पे 

लुट गयी बैरन 

रतिया की निंदिया 

नैनन  में श्याम मलूँ 

तो झपकी सी लागे 

अंजन बेदर्दी मोहे चुभोये कंकरिया 

तज गयो उपवन को  सब सुख चैन 

उतरे ना डारी  रंग बसंती 

लागे ना अंग केसरिया 

तन मोरा चन्दन 

मन की पीर को लिपटे भुजंग 

लागे तीखी तीर सी बंसी 

आग लगाए कूक 

जियरा जलाये पपीहरा 

रोम रोम में चिटके बीज  

खिले कलियन हरी हरी 

मन हरियाला जग उजियारा 

तन हरा हरा रोगन रमा 

 जोगन भयो मन 

ले नाम हरि हरि 

दुल्हन शाम की जोगन बनी 

डोली छोड़ जग छोड़ चली 

कौन सी ये अगन लगी 

जो जली घड़ी घड़ी  

फिर भी ना डरी 

जोगन का जोग चमका ऐसा 

लागे जोगनिया  खरी खरी 

कौन सो लागे अब निर्गुण को हाथ 

कौन दिसा अब ले जाए कहार 

कौन सो सजावे गाम 

मोहे ऐसे सतायो श्याम   

मोहे ऐसे सतायो श्याम 

रूठा गली गलियार 

मोसे छूटे चहुँ  धाम 

मोहे ऐसे सतायो श्याम। 




सौम्या वफ़ा। ©

शनिवार, 8 अगस्त 2020

बादलों के बीच

 टटोलता है रोज़ मन 

 बादलों के बीच अपनी जगह

कुछ लाली, कुछ धूप, कुछ ठंडी छैयां

कुछ फा़हे जैसे उड़ते ख़्वाब

कुछ रेश़म ख़्याल

कुछ पर्दा डाले गर्मी पर

गरज बिगड़ कर बरस जाना

 कुछ ढलती शाम में

छनती रोशनी के तारों पे

अपनी उड़ानों को 

 पंखों से सी लेना

रात ढले चांद जले को 

हौले हौले से सहला के

मलहम लगाना सीख़ लेना

एक नई सुबह को फ़िर पर्दा सरका के

पौ फटने के इंतज़ार में

पड़े पड़े एक झपकी और लगा लेना

पहली आती किरणों को रस्ता दे

अलसाई नींद भगा लेना

टंगे टंगे यूं ही आसमां पे

कुछ अपने उखड़े पाओं 

एक बार फ़िर से जमा लेना।


@सौम्या वफ़ा।०©





औंधी बारिश

 औंधे औंधे मुंह चली आई बारिश

जैसे भूल गई हो रस्ता

धूप अभी तक सिमटी नहीं

ना बादलों का उमड़ा दस्ता

दो बूंदे कहां से जाने

आ कर दे गईं माथे पर

बरसों भूला कोई बोसा

यूं लगा कि अपना ही अक्स है

मगर काश कि अपना होता।


@सौम्या वफ़ा।०©

मन दर्पण

 सबसे सुंदर है बिना कहे 

मन के आंगन में

प्रेम दरपन देख लेना

सबसे मधुर है बिना सुने ही

मौन पड़े सुरों की धुन सुन लेना

सबसे प्रेममय है बिना स्पर्श के ही

आलिंगन में समेट लेना

सबसे मीठा है मन में कड़वा घोले जो 

उसे वहीं रोक लेना

सबसे सुगंधित है

मुरझाए मन में जीवन अमृत बो लेना

मन दर्पण में देखोगे जब भी

सुंदरता की मूरत

दिखेगी अपनी ही 

धुली हुई नई नवेली

भोली सूरत

मन अपना, सूरत अपनी

मन की मूरत में बसती सीरत अपनी

अपनी ही है , अपनी जान के

जब जी चाहे देख लेना

सबसे सुंदर है बिना कहे

मन के आंगन में

प्रेम दर्पण देख लेना।


@सौम्या वफ़ा।०©


शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

सोहबत

 दो हाथ हों वो

घुलती चाशनी की सोहबत

लब हों दो खिले गुलों के शर्बत

घुल जाएं तो रंग गुलाबी हो

और स्वाद हो पानी सी मुहब्बत।


सौम्या वफ़ा।©


बुधवार, 5 अगस्त 2020

बहते बादल

बादलों संग थोड़ा मैं भी बह जाती हूं
थोड़ी सी हवा की ढील हो 
तो पतंग बन लहराती हूं
एक छत है बिना दीवारों
बिना छज्जों की
उसपर चढ़ बैठूं तो फ़िर
जाने क्या क्या बतियाती हूं
ज़मीं पे छोड़ के पाओं को
मुट्ठी में आसमां भर लाती हूं
गरम गरम छनते सूरज के गोले
और चांद का बताशा झोले में भर लाती हूं
पेट थोड़ा ख़ाली सा हो
या जेब सूनी सूनी
पर चंद हवा के खनकते सिक्कों से मैं
पसेरी  भर मन भर लाती हूं
सुबह के भूले दिल को
शामों से बहलाती हूं
बादलों संग थोड़ा मैं भी बह जाती हूं। 



सौम्या वफ़ा।© (२०/६/२०२०).