सोमवार, 11 मई 2020

मर्ज़ी

तुम रौंद दो हमें ये तुम्हारी मर्ज़ी है
हम बनके गुलिस्तां महकते रहेंगे ये हमारी मर्ज़ी है
माना की ख़ुशबू़ओं से इंकार
गुलों पे पर्दा
ये तुम्हारी खु़दगर्ज़ी है
हम बाग़ सजाए
 खु़शबुएं बिखेरते रहें
  ये हमारी खु़दगर्ज़ी है
  जितना चाहे बिगाड़ लो चमन की आबो हवा
हम गुल बनकर खिलते रहेंगे ये हमारी मर्ज़ी है।


सौम्या वफ़ा।©

गंगा

गंगा मा सब जना पाप धोए
गंगा के को धोई?
तारे तारिनी पापन के पाप
तारिनि के को तारन होई?
जे सुमिरन ,सेवन, हनन
हरास, त्रास सब करएं
जे गंगा सुमिरे मानुस को
ते ना कोहू पूछन वाला होए
साधुअन बड़का करैं बखान
लुच्चे लपाडी़ भी खूब बतियावें
आर्टी पार्टी के सब नेता जन
भर लैं वोटन की खदान
जे होली, दिवाली ,
इलेक्सन के बाद मा
ना कोहू को आवे धान
हर हर कर सब हर लिए
भई गंगा के प्राणन की संत्रास
गंगा की हर संतान
मैला कुचैला सब धोए डारे
धोए डारे सब पाप
अब जे गंगा मैली भई
डूब गई कारिख मा
ले सब कलुअन के पाप
के कारिख धोई गंगा के?
को करि गंगा के उद्धार?
जे पापियन अब चलैं
गंगा मा पाप धोए
पूछा पापियन से
कि गंगा के को धोई?
तारे तरिनी पापियन के पाप
तरिनि के को तारन होई?
गंगा मा सब जना पाप धोए!
गंगा के को धोई?



@सौम्या वफ़ा।

रविवार, 10 मई 2020

अंजुली

कभी मुट्ठी में बंद था
अंजुली भर सारा आकाश
मुट्ठी खुली तो कैद से छूटा आकाश
सारे आकाश पर है अब
 खुले पंखों की छाप
 बिखर गए मोती जाली
रह गई सच की कंठी साथ
फिसले जादू के महल सारे
छूट गई हाथ से
बेहरूपिए की ताश
एक  अंजुली सागर समान
जाने ना आकाश का अभिमान
मिली अंधेरे में सच की लौ
जब छोड़ा मुट्ठी से कांच
ना रहे डर में छिपे चेहरे नक़ली
 ना रहे स्वारथ चाशनी के पाश
अज्ञानी की राह से उड़ गई अंजुली
पंछी बन नील गगन के उस पार।



@सौम्या वफ़ा।©®

शुक्रवार, 8 मई 2020

दौर

कभी इक दौर था हम भी हक़ीक़त नहीं
ख़्वाबों में जीते थे
बातों नहीं जज़्बातों को सीते थे
टेढ़ी हर लकीर को सीधी कर लेते थे
किसी के घर सुबह की रौनक को
अपनी रातें काली कर लेते थे
भूल आते थे जानकर उनके घर छतरियां
जिनके घर बारिश में भीगे थे
थोड़ा उनके प्याले की मिठास बढ़ाने को
ख़ुद की चाय फीकी कर लेते थे
महके किसी का आंगन सौंधा सौंधा
माटी सा
हम ख़ुद की ज़मीनें बंजर कर देते थे
वो पूछें महकी है कहां से ये ख़ुशबू
तो बदल बदल कर नाम
इत्रों पर इल्ज़ाम मढ़ देते थे
छिपकर मगर दरअसल
अश्कों से मूंह धोते थे
कभी वो रूठें तो रो पड़ते
कभी वो मनाते तो खिलखिलाकर हंस देते थे
मासूम से थे पर नादान नहीं
जानते थे सौदा है महंगा
और हम ठहरे फ़कीर अनाड़ी
कौड़ी को हीरे के भाओ तोलते  थे
फ़िर भी किश्तें पूरी करने को
बार बार मुहब्बत गिरवी रख देते थे
कभी इक दौर था हम भी हक़ीक़त नहीं
 ख़्वाबों में जीते थे
 बातों नहीं जज़्बातों को सीते थे ।


सौम्या वफ़ा।©

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

दूर के ढोल

ये दुनिया है दूर के ढोल सुहावनी
हर किसी को है अपनी छौंकनी
हर किसी को है अपनी बघारनी
सच्चा सौदा करे जो
खा जाए वो ही गच्चा
पेट ख़ाली
जेबें ख़ाली
दिल थोड़ा थोड़ा रोए
छुप के मां के आंचल में
जैसे रोए बच्चा
थोड़ा चोरी कर ले ख़बरें
थोड़ा जमकर पीटे थाली
कुछ निकलकर खुल्लखुल्ला
हरकतें कर ले मवाली
दिन भारी भारी हो चले हैं
रातें पूरी बवाली
मुंह पर अंगौछा बांधे
मनाए है बिन मौसम दिवाली
अगली सुबह भर भर के
कुट्टमस कर दे उनकी
जो बचाए हैं जान हमारी
अब हर सुबह ख़ुदा खड़ा है
लेके हाथ में डमरू
नाचें हम सब बने जमूरे
एक वो ही ठहरा असली मदारी
एक डुग - डुग हुई नहीं कि
दिल कांपता है धुक- धुक
कश्ती कीचड़ में है जम गई
ना जहाज़ उड़े
ना दौड़े छुक - छुक
लुटेरे बने लूटते रहे
कुदरत को
लूट सके जब तक
अब ख़ुदा ने लाठी ऐसी मारी
कीमतें चुकानी पड़ रही हैं भारी
जल गई है कितनों की रस्सी
फ़िर भी अकड़ नहीं गई सारी
चूल्हा चौका हो गया भसम
दाल गली नहीं
रोटी झुलस गई बेचारी
जिधर देखो उधर
चार कंधों पर
निकल पड़ी है एक सवारी
जाने कब तक चलेगा खेल निराला
ना कहना ये कहावतें हैं पुरानी
दादी नानी की है कहानी
थोड़ा तो अब सुधर जाओ
कि ना पछताना होए दोबारा
ये दुनिया है दूर के ढोल सुहावनी
हर किसी को है अपनी छौंकनी
हर किसी को है अपनी बघारनी ।



सौम्या वफ़ा।©

रविवार, 26 अप्रैल 2020

क़ातिल

रहनुमा नहीं ये जान
क़ातिल की शुक्रगुजा़र है
सीने में हैं ज़ख्म गहरे
मगर लफ़्ज़ों में बहार है
आंखों में दीदार नहीं
मगर अश़्क बेशुमार हैं
होंठ कांपते नहीं अब शर्म से
ना गालों पे
मीठी सुर्ख़ियों के इज़हार हैं
हां मगर बंद पड़ी ज़ुबां पर अब
निखा़र ही निखा़र है
हाथों में अब किसी के हाथों की
गर्मी का इंतज़ार नहीं
माथे पे किसी के बोसों
या सीने की धड़कनों का ऐतबार नहीं
हां मगर मुंदी पीठ अब
ज़ुल्मों का इश़्तेहार है
जान फ़िर भी हथेली पे रख
अभी और जीने को तैयार है
रहनुमा नहीं ये जान
क़ातिल की शुक्रगुजा़र है।


सौम्या वफ़ा।©

अव्वल खिलाड़ी

तुम बड़े नटखट बड़े चंचल थे
जैसे भरी पूरी उमर में भी
बच्चे के बचपन थे
कितना खेला तुमने खेल खिलौनों से
कितने ही तोड़े फेंके
कितनों को रख कर भुला दिया
कितनों को ज़िद से हथिया लिया
तुम बड़े नटखट बड़े चंचल थे
जैसे भरी पूरी उमर में भी
 बच्चे के बचपन थे
 इस बार भी बहुत खेले तुम
 थोड़े झूठ कुछ मुखौटे
 कभी ख़ुद से लाए कभी हमसे लूटे
 खेल खेल कर निकल गए
 बोले हम हैं अव्वल खिलाड़ी
 जाना हमने जब और चोरी पकड़ी
 बोल के निकल गए कि
 अरे पगली हम कब खेले
 हम जो हारे तो हार गए
 क्यूंकि हारे तो भी जीते!
 तुम अपनी कहो
 क्यूं पासा सच्चा खेला नहीं?
 क्यूं फांसा तो झेला नहीं?
 अब जो जग हंसे तुम पे
 तो बच निकले;
 अरे जा रे चल ,झूठे!!!


@सौम्या वफ़ा।©