रविवार, 28 जून 2020

गुच्छे

बस छह क़दम की जगह को
कुछ साइकिलों के गुच्छे ने
भीगने से बचा रखा है
ख़ुद भीगते जंक खाते ये गुच्छे
वो छत हैं
जिसके तले कई क़िरदार महफूज़ हैं
महफूज़ हैं
नन्हीं हंसी और किलकारियां
चूल्हे की आंच
तेल की झार
रोटी की ख़ुशबू
और गुड़ की मिठास
महफूज़ है कोई
लरजती कांपती बूढ़ी आवाज़
और महफूज़ है किसी के दो हाथों की
चार चूड़ियां
साथ ही महफूज़ है
इसके सवार की भीगती रूह
जिसका जिस्म अब महज़ कंकाल है
इस तरह से बस छह क़दम की जगह को
कुछ साइकिलों के गुच्छे ने
भीगने से बचा रखा है।



सौम्या वफ़ा।(1/1/2019).

सोनू टी स्टॉल

अंडे  , भुजिया, पकौड़ियां
चाय, अदरक, टॉफियां
गणेश जी को उम्मीद से निहारते
साईं बाबा
अंधेरी शेल्फों में छिपी पड़ी
सिगरेट की डिब्बियां
जलने को त्यार लटका
रंग बिरंगा लाइटर
माचिसों की पुलिया
मौसम में ठंडी बरसात
हर चाय के प्याले में राहत
और टकटकी लगाए
कुछ सीली चूरन की गोलियां
हर पुड़िया में छोटी छोटी खुशियां
ये सब कुछ था
सोनू टी स्टॉल पे
बस नहीं था
तो सोनू टी स्टॉल पे कोई गाहक नहीं था
कुछ लोगों को वो ख़ुद याद नहीं थे
और कुछ को लेमन ग्रास के क्रेज़ में
आड़ी तिरछी बढ़ती अद्रकों की याद कहां।



सौम्या वफ़ा। (28/6/2019).

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी से और कुछ नहीं
बस एक सांस भर ज़िन्दगी चाहिए
एक सांस जिसमें सारी हवा भर के
ज़िन्दगी बादलों के बीच उड़ती हो
एक सांस जिसमें सारी फिज़ा भर के
किसी पागल धुन में
मेरी रूह फिरती हो
एक सांस जो आख़िरी हो
मगर उसमें पहली सांस वाली बात हो
एक सांस जिसमें घुल के
हवा इत्र बन जाती हो
एक सांस जो छूटे जां से
तो मुस्कुराती हो
एक सांस जो बिना वजह मन को गुदगुदाती हो
ज़िन्दगी से और कुछ नहीं
बस एक सांस भर ज़िन्दगी चाहिए।


सौम्या वफ़ा।(6/1/2019).



दो बीज

इक रोज़ जब मैं आंगन में खड़ी
सूप में इश्क़ पछोर रही थी
तब अनजाने में ही
तुम्हारे इश्क़ के दो बीज
मेरे आंगन के कोने में जाकर छिप गए
कई रोज़ बाद देखा
वहां नन्हीं नन्हीं हरी कोपलें फूटी थीं
मैंने सोचा क्यूं ना इन्हें
बीच आंगन में
तुलसी की छांह में रोपूं
पर जैसे ही मैंने उन्हें
इस एहसास से हाथ लगाया
वो दोनों सहम कर सकुचा गए
वो तुलसी के साथ नहीं
बल्कि एक कोने में अपना घर बसाना चाहते थे
नलके के पानी से नहीं
बारिश के इंतज़ार से ख़ुद को
सींचना चाहते थे
फ़िर ख्याल आया
ये हमारे इश्क़ की फूटी कोपलें ही तो हैं
इन्हें बारिश का ही इंतजार रहेगा
इन्हें तुलसी की छांह नहीं
अपने सर पर
छोटे से आसमान का ही इंतजार रहेगा।



सौम्या वफ़ा। (7/1/2019).

शनिवार, 20 जून 2020

क़दम

जिस घर से चले थे उसी की राह भूल जाते हैं
उठते डगमगाते क़दम कहीं गुम जाते हैं
कुछ को ख़ुद याद नहीं रहता कुछ भी
कुछ गुमशुदा हो जाते हैं
कुछ उन्हीं भूली बिसरी सी शक्लों में लौट आते हैं
कुछ मिल के भी नहीं मिलते
कुछ मिलते हैं तो
बस निशां रह जाते हैं
कुछ जाते हैं तो उन्हीं क़दमों पर
चौदह चांद चमक जाते हैं
कुछ को ढूंडो तो
सोलह सिंगार मिल जाते हैं
बाकी चार क़दम की तलाश में
बस इश़्तहार रह जाते हैं
कुछ क़दमों की आहट से
रोशन आंगन जगमगाते हैं
कुछ भटके थे सुबहो को
तो शाम को भी नहीं
लौट पाते हैं
नादां क़दम जिस घर से चले थे
उसी की राह भूल जाते हैं।




सौम्या वफ़ा।०

रविवार, 7 जून 2020

घर और शहर

टूटे टूटे टुकड़ों से जो कुछ भी
बसाया है टीन टप्पर का शहर
बड़े सबर से भरे पूरे बसर का
ख़्वाब लगाया है दांव पर
कभी तो जज़्बे सा लगता है
कभी लगता है दीवानगी
कभी कहता है जो है सब यहीं है
फ़िर मुकर जाता है
जब हो बात सच की
दिल जानता है वो देता है झूठी गवाही
कहीं है अपना सब
तो अपने नहीं
कहीं अपने हैं तो अपना जो है वो नहीं
एक छत है सुनहरी अरमानों की
जहां भीड़ है बस अनजानों की
एक ज़मीं है मां की कोख़ सी नरम
मगर वहां पंख पसारने को
 सारा आसमां नहीं
एक महल है हसरतों का जिसे
घर बनाने की बेवजह है सारी मशक्कत
एक है गहरा दरख़्त मज़बूत
और एक है नन्हा शजर
एक टूटी फूटी छप्पर तले
छोटे छोटे बीजों की बोई है सारी जागीर
इक छत पर है नाम कल की सुबह का
इक ज़मीं है पीछे छूटी उम्र की तामीर
दुनिया से नहीं अरमानों से हैं खफा
इन अरमानों पे चढ़ी हैं कई
अनकही ठोकरों की कहानी
जिनकी मुस्कुराहटों के पीछे
 छिप जाती है मेरी पशेमां तन्हाई
 कितनी बार अश्कों के सितारे
 चमका देती है किनारों पर
जाने कितनी मजबूरियों की बानगी
 जब जब होती है पाओं तले ज़मीन से
एक अदद छत को रवानगी ।


@सौम्या वफ़ा ०।©

सोमवार, 1 जून 2020

डोर

कच्ची डोर है इश्क़
बिजली का तार नहीं
हौले हौले उठती गिरती
तरंगें हों,तो है बात कोई
एक बार के झटके में
जल जाने का मज़ा ख़ाक नहीं
इश्क़ की डोर चले थोड़ी सीधी
उड़ ले सांसें भर के जब ढील दें
तनातनी की बात में
तोड़ मरोड़ है
रिश्ता बेजोड़ नहीं
तेज़ आंच पे चढ़े इश्क़ में
मद्धम आंच का स्वाद नहीं
छूटे अगर हाथ तो
छोड़ दो सरल डोर भी
टुकड़ों से ख़ाली हाथ भले
टुकड़ों से बसता संसार नहीं
डोर आए तो सहेज लो
गांठों का पैबंद का कोई मोल नहीं
जो जाने कि इश्क़ है
तार बिजली
वो छिपा छिपा रखते हैं जेबों में
ख़ुद के हांथ जले
इश्क़ की डोर सब्र से
चरखा चढ़े
हौले हौले कातें
हौले हौले सिएं
चाहे तो बना लें ओढ़नी
चाहे तो रज़ाई बुन लें।


सौम्या वफ़ा।०©