Baatbaatpekavita
गुरुवार, 30 अप्रैल 2020
दूर के ढोल
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ये दुनिया है दूर के ढोल सुहावनी हर किसी को है अपनी छौंकनी हर किसी को है अपनी बघारनी सच्चा सौदा करे जो खा जाए वो ही गच्चा पेट ख़ाली जे...
रविवार, 26 अप्रैल 2020
क़ातिल
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रहनुमा नहीं ये जान क़ातिल की शुक्रगुजा़र है सीने में हैं ज़ख्म गहरे मगर लफ़्ज़ों में बहार है आंखों में दीदार नहीं मगर अश़्क बेशुमार है...
अव्वल खिलाड़ी
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तुम बड़े नटखट बड़े चंचल थे जैसे भरी पूरी उमर में भी बच्चे के बचपन थे कितना खेला तुमने खेल खिलौनों से कितने ही तोड़े फेंके कितनों को रख...
दरिया
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दरिया के इस पार थे लेकर नाम तुम्हारा दरिया से उस पार को चले लेकर नाम तुम्हारा जाना तुम्हें माझी मगर तुम सैलाब निकले डूबे फ़िर मझधार में...
तेरा तुझको अर्पण
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सांसों का तेरी मैं चढ़ाऊंगी धतूरा तुम मेरी सांसों का पी लेना महुआ डोलेंगे हम फिर पंख लगाए जैसे माटी उड़े बनके धुआं खींच लेना अपनी पलकों...
दूर कहीं
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दूर कहीं उड़ती हवा ने जाने क्यों घर बसाने का सोचा हवा का घरौंदा आकाश पर ही हो सकता है ये कहकर एक दिन आकाश ने हवा को बादलों से ये संदेसा...
हवा और हैरानी
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हवा से कहो अब हवा हवा हो गई है और हैरानी ने हैरान होकर दम है तोड़ दिया कोई आकर आग़ से कह दो कि अब पिघला कर बुझा दे ये बेवजह फड़फड़ाती ...
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